मैं चलता रहा,
चलता रहा,
पर मंजिल का
निशाँ नही,
भीड़ से गुजरता
रहा,
पर मिला कोई
इंसान नही,
कुछ ही पत्थर
निकले मील
के,
नामालूम कितने निकलने
बाकी हैं,
अभी तो कदम
उठे हैं
मेरे,
न जाने कितना
चलना बाकी
है...
थका भी, टुटा
भी,
पर कदम रुके
नही,
लेकिन अरमान झुके
नही,
उठा हर बार
जब भी
गिरा,
पर अभी संभलना
बाकी है,
अभी तो कदम
उठे हैं
मेरे,
न जाने कितना
चलना बाकी
है..
दोस्त-यार, घर-परिवार,
सब पीछे छुट
गए,
कई सालो के
बने रिश्ते,
एक पल में
ही टूट
गए,
पर मुझे न
अब पीछे
मुड़ना है,
मेरे तो अभी
पंख नए
हैं,
मुझे तो और
ऊँचा उड़ना
है,
अभी तो काली
रात गई
है,
भानु निकलना बाकी
है....
अभी तो कदम
उठे हैं
मेरे,
न जाने कितना
चलना बाकी
है..
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